मान-माधुरी · पद 54
श्री राधे रानी, परूँ तिहारे पाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe rānī! parūṁ tihāre pāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्री राधे रानी, परूँ तिहारे पाय।
2तू भोरी कछु भेद न जानति, हारी सरल सुभाय।
3ये अति चतुर सखी-ललितादिक, झूठेहिं बात बनाय।
4सुनु मानिनि! हौं साँचु कहौं मोहिं, कुंजन सखिन बुलाय।
5हौं न जात, तो बात बनावति, तू साँचेहि पतियाय।
6तुम जानति"यह तुम्हरो तुम बिनु, पल छिन रहि न सकाय"।
7सुनि “कृपालु” मानिनि अति भोरी, लियो अंक भरि धाय॥
हिन्दी भावार्थ
(मानिनी वृषभानुनन्दिनी को मनाते हुए श्री श्यामसुन्दर आ हैं।) हे किशोरी जी! तुम अत्यन्त ही भोली हो। अपने सरल स्वभाव से हारी हुई हो, अतएव इन सखियों की चाल को नहीं जानतीं। ये अत्यन्त ही चतुर ललिता आदि सखियाँ झूठ-मूठ को ही बातें बना-बनाकर तुमको भड़काया करती हैं। हे किशोरी जी! मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि मुझे ये ही सदा कुंज में बुलाती हैं किन्तु मैं नहीं जाता। इसलिए यह खीझकर तुमसे बातें बनाया करती हैं और तुम इनकी बातों का विश्वास कर लेती हो। हे किशोरी जी तुम भली-भाँति जानती हो कि यह तुम्हारा प्रियतम तुम्हारा है, तुम्हारे सिवा और किसी से प्रेम नहीं करता। और न तुम्हारे बिना एक क्षण जीवित ही रह सकता है। 'कृयालु'कहते हैं कि भोली-भाली किशोरी जी ने इन छल भरे वचनों में आकर, प्रियतम को गले लगा लिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 667