# श्री राधे रानी, परूँ तिहारे पाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0707-M16-K054
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 54
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 332–332

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>श्री राधे रानी, परूँ तिहारे पाय।  
<a id="line-2"></a>तू भोरी कछु भेद न जानति, हारी सरल सुभाय।  
<a id="line-3"></a>ये अति चतुर सखी-ललितादिक, झूठेहिं बात बनाय।  
<a id="line-4"></a>सुनु मानिनि! हौं साँचु कहौं मोहिं, कुंजन सखिन बुलाय।  
<a id="line-5"></a>हौं न जात, तो बात बनावति, तू साँचेहि पतियाय।  
<a id="line-6"></a>तुम जानति"यह तुम्हरो तुम बिनु, पल छिन रहि न सकाय"।  
<a id="line-7"></a>सुनि “कृपालु” मानिनि अति भोरी, लियो अंक भरि धाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(मानिनी वृषभानुनन्दिनी को मनाते हुए श्री श्यामसुन्दर आ हैं।) हे किशोरी जी! तुम अत्यन्त ही भोली हो। अपने सरल स्वभाव से हारी हुई हो, अतएव इन सखियों की चाल को नहीं जानतीं। ये अत्यन्त ही चतुर ललिता आदि सखियाँ झूठ-मूठ को ही बातें बना-बनाकर तुमको भड़काया करती हैं। हे किशोरी जी! मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि मुझे ये ही सदा कुंज में बुलाती हैं किन्तु मैं नहीं जाता। इसलिए यह खीझकर तुमसे बातें बनाया करती हैं और तुम इनकी बातों का विश्वास कर लेती हो। हे किशोरी जी तुम भली-भाँति जानती हो कि यह तुम्हारा प्रियतम तुम्हारा है, तुम्हारे सिवा और किसी से प्रेम नहीं करता। और न तुम्हारे बिना एक क्षण जीवित ही रह सकता है। 'कृयालु'कहते हैं कि भोली-भाली किशोरी जी ने इन छल भरे वचनों में आकर, प्रियतम को गले लगा लिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 667

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
