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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 53

मानिनी! कासों सीखी मान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! kāsoṁ sīkhī māna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनी! कासों सीखी मान।

2सद्गुरु कौन दीन गुरु-दीक्षा, फूँकेउ तुम्हरे कान।

3ताने भृकुटि-कमान गुमानन, पायो भल गुरु-ज्ञान।

4प्रणय करन सिखयो नहिं सद्गुरु, ज्ञान अधूरो जान।

5सद्गुरु करे जानि के जग महँ, पानी पीवे छान।

6कहति विशाखा हौं लाई लखु, सद्गुरु एक महान।

7हँसीं “कृपालु” लली ललितहिं लखि, संत भेष किय ध्यान॥

हिन्दी भावार्थ

(मानिनी किशोरी जी को विशाखा सखी का हे किशोरी जी! तुमने यह मान करना किससे सीखा है? तुम्हें किस सद्गुरु ने कान फूँक कर मान करने की दीक्षा दी है। भौंहों को ताने हुए अत्यन्त ही गुमान में भरी हुई तुमने मान करने का बड़ा सुन्दर अभ्यास सीखा है किन्तु तुम्हारा यह सद्गुरु अधूरे ज्ञान वाला ही था जिसने तुम्हें मान करना तो सिखाया किन्तु मान त्याग कर प्रीति करना नहीं सिखाया। देखो किशोरी जी! लोक में भी यह कहावत प्रसिद्ध है कि बहुत समझ-बूझकर सद्गुरु करना चाहिये। विशाखा कहती है कि हे किशोरी जी! मैं तुम्हारे लिये बहुत ही पहुँचा हुआ सद्गुरु लायी हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि ज्योंही किशोरी जी ने मुड़कर पीछे की ओर देखा, उन्हें सन्त का वेश बनाये हुए एवं ध्यानस्थ, ललिता दिखायी पड़ी। उन्हें देखकर किशोरी जी हँस पड़ीं एवं उनका मान भंग हो गया।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 666-667