# मानिनी! कासों सीखी मान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0706-M16-K053
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 53
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 331–332

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मानिनी! कासों सीखी मान।  
<a id="line-2"></a>सद्गुरु कौन दीन गुरु-दीक्षा, फूँकेउ तुम्हरे कान।  
<a id="line-3"></a>ताने भृकुटि-कमान गुमानन, पायो भल गुरु-ज्ञान।  
<a id="line-4"></a>प्रणय करन सिखयो नहिं सद्गुरु, ज्ञान अधूरो जान।  
<a id="line-5"></a>सद्गुरु करे जानि के जग महँ, पानी पीवे छान।  
<a id="line-6"></a>कहति विशाखा हौं लाई लखु, सद्गुरु एक महान।  
<a id="line-7"></a>हँसीं “कृपालु” लली ललितहिं लखि, संत भेष किय ध्यान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(मानिनी किशोरी जी को विशाखा सखी का हे किशोरी जी! तुमने यह मान करना किससे सीखा है? तुम्हें किस सद्गुरु ने कान फूँक कर मान करने की दीक्षा दी है। भौंहों को ताने हुए अत्यन्त ही गुमान में भरी हुई तुमने मान करने का बड़ा सुन्दर अभ्यास सीखा है किन्तु तुम्हारा यह सद्गुरु अधूरे ज्ञान वाला ही था जिसने तुम्हें मान करना तो सिखाया किन्तु मान त्याग कर प्रीति करना नहीं सिखाया। देखो किशोरी जी! लोक में भी यह कहावत प्रसिद्ध है कि बहुत समझ-बूझकर सद्गुरु करना चाहिये। विशाखा कहती है कि हे किशोरी जी! मैं तुम्हारे लिये बहुत ही पहुँचा हुआ सद्गुरु लायी हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि ज्योंही किशोरी जी ने मुड़कर पीछे की ओर देखा, उन्हें सन्त का वेश बनाये हुए एवं ध्यानस्थ, ललिता दिखायी पड़ी। उन्हें देखकर किशोरी जी हँस पड़ीं एवं उनका मान भंग हो गया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 666-667

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
