मान-माधुरी · पद 52
सखी मैं, परूँ तिहारे पाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī maiṁ, parūṁ tihāre pāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी मैं, परूँ तिहारे पाय।
2वेगि मोहिं दिखराउ गौर-मुख, उन बिन रह्यो न जाय।
3जो तू कहे सोइ हौं करिहौं, ललिते! लागु सहाय।
4इमि कर जोरत, सखिन निहोरत, कहत"राधिके! हाय!"।
5ढूँढ़त, फिरत निकुंजनि मोहन, गिरत धरणि बिलखाय।
6कह “कृपालु” अति मंद सुरन सों, लागी बुरी बलाय॥
हिन्दी भावार्थ
(किशोरी जी के वियोग में श्री श्यामसुन्दर ललिता सखी से निहोरा करते हुए कहते हैं।) अरी सखी मैं तुम्हारे पैरों को छूता हूँ। मुझे शीघ्र ही किशोरी जी से मिला दो। उनके बिना मुझसे रहा नहीं जाता। हे ललिते! तेरे सिवा मेरे दुःख को और कौन समझता है? तू जो कुछ भी कहेगी, मैं वही करूंगा। इस प्रकार श्री श्यामसुन्दर हाथ जोड़कर सखियों का निहोरा करते हुए "हा राधे! हा राधे!! कहकर आहें भरते हैं एवं लताओं की कुंजों में किशोरी जी को हूँढते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। उन्हे इस दशा में देखकर 'कृपालु'अत्यन्त धीरे से कहते हैं, "लागी बुरी बलाय।'अर्थात् प्रेम करना अत्यन्त ही बुरा है क्योंकि प्रेम हो जाने पर वियोग अवश्य होता है एवं वियोग का दुःख मृत्यु के दुःख से भी महान् होता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 665-666