# सखी मैं, परूँ तिहारे पाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0705-M16-K052
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 52
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 331–331

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी मैं, परूँ तिहारे पाय।  
<a id="line-2"></a>वेगि मोहिं दिखराउ गौर-मुख, उन बिन रह्यो न जाय।  
<a id="line-3"></a>जो तू कहे सोइ हौं करिहौं, ललिते! लागु सहाय।  
<a id="line-4"></a>इमि कर जोरत, सखिन निहोरत, कहत"राधिके! हाय!"।  
<a id="line-5"></a>ढूँढ़त, फिरत निकुंजनि मोहन, गिरत धरणि बिलखाय।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” अति मंद सुरन सों, लागी बुरी बलाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(किशोरी जी के वियोग में श्री श्यामसुन्दर ललिता सखी से निहोरा करते हुए कहते हैं।) अरी सखी मैं तुम्हारे पैरों को छूता हूँ। मुझे शीघ्र ही किशोरी जी से मिला दो। उनके बिना मुझसे रहा नहीं जाता। हे ललिते! तेरे सिवा मेरे दुःख को और कौन समझता है? तू जो कुछ भी कहेगी, मैं वही करूंगा। इस प्रकार श्री श्यामसुन्दर हाथ जोड़कर सखियों का निहोरा करते हुए "हा राधे! हा राधे!! कहकर आहें भरते हैं एवं लताओं की कुंजों में किशोरी जी को हूँढते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। उन्हे इस दशा में देखकर 'कृपालु'अत्यन्त धीरे से कहते हैं, "लागी बुरी बलाय।'अर्थात् प्रेम करना अत्यन्त ही बुरा है क्योंकि प्रेम हो जाने पर वियोग अवश्य होता है एवं वियोग का दुःख मृत्यु के दुःख से भी महान् होता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 665-666

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
