मान-माधुरी · पद 51
बताओ सखि! राधे गई कौनी ओर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: batāo sakhi! rādhe gaīṁ kaunī ora?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बताओ सखि! राधे गई कौनी ओर।
2पैयां परूँ, मैं हा, हा! खाऊँ, लेउँ बलैयाँ तोर।
3जल बिनु मीन जिये बरु सजनी, रवि बिनु हो बरु भोर।
4प्रियाहीन पै प्रान न रहि सक, कीजै यतन करोर।
5पल-पल कलप कोटि सम लागत, उठति हूक हिय घोर।
6सिगरी कहति"प्राणप्रिय"मोको, लेन प्रान चह मोर।
7कहि “कृपालु” "राधे! राधे"पुनि, मुर्छित नवल किशोर॥
हिन्दी भावार्थ
(श्री राधिकाजी मान करके कहीं चली गयी हैं। उनके वियोग में प्रियतम श्यामसुन्दर सखियों से पूछते हैं।) अरी सखियों! बताओ तो सही कि किशोरी जी किस ओर चली गयी हैं? मैं तुम्हारे चरण छूता हूँ, हा-हा खाता हूँ एवं बार-बार बलैया लेता हूँ। अरी सखियों! जल के बिना मछली भले ही जीवित रह जाये एवं सूर्य के बिना भी चाहे प्रभात होने लगे किन्तु किशोरी जी के बिना करोड़ों उपायों को करने पर भी मैं जीवित नहीं रह सकता। मुझे उनके बिना एक-एक क्षण कल्प के समान लगता है। हृदय में घोर पीड़ा होती है। अरी सखियों! तुम सब तो मुझे प्राणाधिक-प्रिय कहा करती थीं किन्तु अब तुम्हीँ लोग किशोरी जी को न बताते हुए मेरे प्राणों की ग्राहक बन रही हों। 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर इस प्रकार विलाप करते हुए 'हा राधे! हा राधे!! होकर गिर पड़े।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 664-665