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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 50

लख्यो पिय, कुंज-भवन भननात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhyo piya, kuñja-bhavana bhananāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लख्यो पिय, कुंज-भवन भननात।

2बड़ोइ भयानक कुंज-भवन लखि, मन-ही-मन डरपात।

3प्रतिहारिनि चहुँ दिशि लखि डोलत, पूछत"सखि का बात"?।

4एकहु सखि नहिं बात बतावति, तब औरहुँ घबरात।

5दृगन झरत, सखि-पगन परत, अति, आरत"हा! हा"खात।

6झटकि पटकि सब आँखि दिखावति, पिय व्याकुल बिलखात।

7धाय “कृपालु” ललिहिं कह ललिता,"आये श्यामल गात"॥

हिन्दी भावार्थ

(किशोरी जी की आज्ञा के अनुसार सखियों के पहरे हो जाने के पश्चात् श्यामसुन्दर के आने पर वहाँ की स्थिति का वर्णन।)। गण श्यामसुन्दर ने कुंज महल को अत्यन्त ही सुनसान देखा। अत्यन्त ही भयानक कुंजभवन को देखकर प्रियतम मन-ही-मन डरने लगे। महल के चारों ओर सखियों का पहरा देखकर उनसे पूछते हैं, 'अरी संखीं! आज क्या बात है? किन्तु जब कोई भी सखी कुछ भी उत्तर नहीं देती तब और भी घबड़ाने लगे। बार-बार अनेक सखिंयों के चरण पकड़ते हैं एवं उनके चरणों पर आँसू बहाते हैं तथा अत्यन्त ही कातर होकर हा हा खाते हैं किन्तु सखियाँ झटक करके आँखें दिखाती हुई दूर चली जाती हैं और प्रियतम वहीं खड़े-खड़े रोतें रहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इतने में ही दौड़कर ललिता ने किशोरी जी से कहा कि हे किशोरी जी! श्यामसुन्दर आ गये।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 663-664