मान-माधुरी · पद 49
सखी सब, सुनहु बात इत आय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī saba, sunahu bāta ita āya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी सब, सुनहु बात इत आय।
2आवत ह्वैहैं मोहिं मनावन, बातन कछुक बनाय।
3याते तुम सब कुंज-महल की, बनहु पहरुवा जाय।
4सावधान ह्वै करु रखवारी, मो ढिग आन न पाय।
5सुनहु और, जब आवे वाते, कोऊ जनि बतराय।
6चुपके ते “कृपालु” मोहिं ललिता, तुरतहिं आय बताय॥
हिन्दी भावार्थ
(मानिनी किशोरी जी का अपनी अन्तरंग सखियों से क ओ सखियों! तुम यहाँ आकर मेरी बात सुनो। देखो! श्यामसुन्दर कुछ बातें गढ़कर अभी मुझे मजाने आते होंगे। इसलिए तुम सभी कुंज महल की रक्षा के लिए पहरेदार बन जाओ एवं अत्यन्त सावधानी के साथ कुंज महल के चारों ओर पहरा दो। वे मेरे पास आने न पावें। देखो! एक और आज्ञा है कि वे जब यहाँ पर आवें तब उनसे कोई भी सखी कुछ न बोले। 'कृपालु' कहते हैं कि आते ही चुपके से मुझे ललिता सूचित कर दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 662-663