मान-माधुरी · पद 48
मानिनी! मान की बान बुरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! māna kī bāna burī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मानिनी! मान की बान बुरी।
2तव छवि मधु-मखियाँ पिय-अँखियाँ, नहिं मानति निगुरी।
3निकसन चह असुरी अब तुम बिन, सुधि भूली बँसुरी।
4पुनि पुनि कहत बिलखि"हा राधे!, कुंजनि कौन दुरी"।
5दुहुँन रुवावति मान-बानि यह, विष की बुझी छुरी।
6तुम “कृपालु” दोउ विलग न रहि सक, ज्यों घन ते बिजुरी॥
हिन्दी भावार्थ
(मानिनी किशोरी जी को मनाती हुई ललिता की ) हे किशोरी जी! तुम्हारी यह बार-बार रूठ जाने की बात अच्छी नहीं है। प्रियतम की आँखें तुम्हारे रूप की मधुमविखयाँ बन चुकी हैं। वे अब तुम्हारे बिना किसी भी प्रकार से प्रियतम को चैन नहीं लेने देती। अब प्रियतम के प्राण निकलना ही चाहते हैं एवं उन्हें अब तुम्हारे आगे अपनी प्राणाधिक-प्रिय मुरली का भी ध्यान नहीं रहा। वे बार बार व्याकुल होकर कहते हैं 'हा राधे! तुम कौन सी कुंज में छुप गयीं?'है किशोरी जी! यह विष की बुझी हुई छुरी के समान तुम्हारी मान की बान तुम दोनों को रुलाती है, अतएव इसे छोड़ो। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम दोनों एक-दूसरे से पृथक् उसी प्रकार नहीं रह सकते जिस प्रकार बादलों से बिजली।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 662