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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 47

मानिनी! कौन तिहारी बान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! kauna tihārī bāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनी! कौन तिहारी बान।

2भरी गुमान तान दोउ भृकुटिन, छिन छिन ठानति मान।

3रस महँ विरस करत निशि-वासर, करि करि उर अभिमान।

4तलफत ज्योँ जल-हीन मीन त्योँ, तुम बिनु कान्ह सुजान।

5आरत बने पुकारत, हारत, कुंज-लतान-पतान।

6भई “कृपालु” निठुर कब ते तुम, तोहिं सरल सब जान॥

हिन्दी भावार्थ

(रूठी हुई किशोरी जी को मनाती हुई ललिता कहती है।) हे किशोरी जी! यह तुम्हारी कौन सी बात है? बार-बार भौँहों को ताने हुए अभिमान के सहित मान किया करती हो। निरन्तर ही इस प्रकार अभिमान कर-करके मधुर-मिलन-रस ल कटु वियोग विष को घोला करती हो, जिसके परिणाम स्वरूप तुम्हारे वियोग में जलहीन मछली की तरह प्यारे श्यामसुन्दर तड़पा करते हैं। हे किशोरी जी! वे प्रियतम अधीर होकर निकुंज लताओं में तुम्हें पुकारते-पुकारते थक जाते हैं। कृपालु' कहते हैं कि तुम्हें तो सारा संसार सरल एवं भोली जानता है। तुम कठोर हृदय वाली कब से बन गई कि तुम्हें प्राणप्यारे के लिए भी दया नहीं आती, तुम्हें तो सभी सरल स्वभाव वाली समझते थे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 661