मान-माधुरी · पद 46
मानिनी, तुम्हरे उर नहिं पीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! tumhare ura nahiṁ pīra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मानिनी, तुम्हरे उर नहिं पीर।
2उत विरहागिनि जरत छिनहिं छिन, सुंदर श्याम शरीर।
3ठाने मान गुमान इतै तुम, बैठीं छुटि लट चीर।
4तुम बिन इक छिन कल नहिं, पल पल, तलफत होत अधीर।
5दृग-अँसुवन सों हार पिरोवत, बैठो यमुना-तीर।
6"लै कोउ प्राण, प्राण प्यारी कहँ", कहत"लाउ अब वीर"।
7अति, अति बुरी “कृपालु” जात परि, बहुत मिठाइहुँ कीर॥
हिन्दी भावार्थ
(मानिनी राधिका को ललिता सखी का मनाना।) हे मानिनी! तुम्हारे हृदय में थोड़ी भी दया नहीं है। क्योंकि उधर तो श्यामसुन्दर का शरीर विरह की अग्नि में प्रतिक्षण जल रहा है और इधर तुम अपनी वेणी को खोले हुए तथा म को फेंककर मान के गुमान में बैठी हो। प्रिम को तुम्हारे बिना एक क्षण के लिए भी चैन नहीं है। बे अधीर होकर निरन्तर तड़प रहे हैं। यमुना के किनारे अकेले ही बैठे हुए आँखों के आँसुओं से हार-सा गुँथते हुए बार-बार अधीर होकर कहते हैं, 'अरे कोई प्राण भी लेकर प्राणप्यारी किशोरी जी को एक बार दिखा दो।'"कृपालु' कहते हैं कि हे किशोरी जी! अति सबकी बुरी होती है, अतएव अतिशय मान भी बुरा है। अत्यन्त मिठाई में भी कीड़े पड़ जाते हैं, यह लोक में प्रसिद्ध है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 660-661