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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 45

मानिनी, भई बेर अब मान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī! bhaī bera aba māna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनी, भई बेर अब मान।

2तजु अभिमान गुमान मान को, जान चहत पिय प्रान।

3खरकत पात चौंकि, तोहिं आवत, जान कान्ह कर कान।

4कबहुँक इत उत भाजत तुम्हरोइ, धरे ध्यान नहिं आन।

5कबहुँक"हा राधे"कहि मुर्छित, छिति पर गिरत, न ध्यान।

6तुम “कृपालु” दोउ एक बनहु जनि, जानि जानि अनजान॥

हिन्दी भावार्थ

(मानिनी राधिका जी को ललिता सखी का मनाना!) अरी ओ रूठी हुई राधे अब तो मुझे मनाते-मनाते बड़ी देर हो गयी, अतएव मेरी बात मान ले। अरी मानिनी! प्रियतम के प्राण निकलना चाहते हैं और तुम अब भी मान के अभिमान में चूर हो। यह ठीक नहीं है। प्यारे श्यामसुन्दर की यह अवस्था है कि जब कहीं पास में पत्ता भी खटकता है तब वे चौंक कर अत्यंत व्याकुल दृष्टि से उसी ओर कान लगाकर देखने लगते हैं। प्रियतम समझते हैं कि तुम ही आ रही हो। कभी वे अपनी सूधि-बुधि भूले हुए तुम्हारे ही ध्यान में निमग्न, मानो तुम्हे पकड़ने के लिए इधर-उधर भागते हैं। कभी 'हा राधे!'कहकर पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम दोनों एक ही हो, बनो मत, जान जानकर अनजान बनना तुम्हें अधिक आता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 659-660