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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 44

जहँ रहे रैन जाहिं वोहि घर री।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jahaṁ rahe raina jāhiṁ vohi ghara rī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1जहँ रहे रैन जाहिं वोहि घर री।

2तू मति की भोरी नहिं जानति,

3वृथहिं सखी! रहि पायन पर री।

4रति-रस-चिह्न प्रकट तनु दीखत,

5अबहुँ रही कछु कोर कसर री।

6हौं सिगरी निशि जागि बिताई,

7दोउ दृग रह निर्झर जनु झर री।

8उत चंद्रावलि घर वे विहरत,

9इत हौं विरह-अगिनि रहि जर री।

10"कृष्ण पक्ष चन्द्रावलि"सुनि हम,

11मन “कृपालु” अचरज बड़ कर री॥

हिन्दी भावार्थ

(एक सखी श्यामसुन्दर का पक्ष करती हुई मानिनी किशोरी जी से श्रीकृष्ण के लिए क्षमा माँगती है, किशोरी जी उसके उत्तर में कहती हैं। अरी सखी! वे रात भर जिसके (चन्द्रावली के) घर में रहे हैं उनसे कह दो वहीं जायें। अरी सखी! एवं अनजान है। तू व्यर्थ ही मेरे पैर पकड़ती है। विहार के चिह्न उनके शरीर में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहे हैं। क्या अब भी कुछ कसर रह गयी है? आँखों से आँसुओं की धारा बरसाते हुये सारी रात जागकर बिताई है। वे चन्द्रावली के घर में विहार करते रहे और मैं विरह की आग में जलती रही 'कृपालु'अपने लिये कहते हैं कि कृष्णपक्ष (श्यामसुन्दर के पक्ष) में चन्द्रावली (सखी का नाम) को देखकर अपने मन में आश्चर्य मत करो, अथवा कुष्णपक्ष ( अँधेरा पक्ष) में चन्द्रावली (चन्द्रमा के झुण्ड) को देखकर आश्चर्य मत करो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 658-659