# जहँ रहे रैन जाहिं वोहि घर री।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0697-M16-K044
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 44
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 327–328

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>जहँ रहे रैन जाहिं वोहि घर री।  
<a id="line-2"></a>तू मति की भोरी नहिं जानति,  
<a id="line-3"></a>वृथहिं सखी! रहि पायन पर री।  
<a id="line-4"></a>रति-रस-चिह्न प्रकट तनु दीखत,  
<a id="line-5"></a>अबहुँ रही कछु कोर कसर री।  
<a id="line-6"></a>हौं सिगरी निशि जागि बिताई,  
<a id="line-7"></a>दोउ दृग रह निर्झर जनु झर री।  
<a id="line-8"></a>उत चंद्रावलि घर वे विहरत,  
<a id="line-9"></a>इत हौं विरह-अगिनि रहि जर री।  
<a id="line-10"></a>"कृष्ण पक्ष चन्द्रावलि"सुनि हम,  
<a id="line-11"></a>मन “कृपालु” अचरज बड़ कर री॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखी श्यामसुन्दर का पक्ष करती हुई मानिनी किशोरी जी से श्रीकृष्ण के लिए क्षमा माँगती है, किशोरी जी उसके उत्तर में कहती हैं। अरी सखी! वे रात भर जिसके (चन्द्रावली के) घर में रहे हैं उनसे कह दो वहीं जायें। अरी सखी! एवं अनजान है। तू व्यर्थ ही मेरे पैर पकड़ती है। विहार के चिह्न उनके शरीर में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहे हैं। क्या अब भी कुछ कसर रह गयी है? आँखों से आँसुओं की धारा बरसाते हुये सारी रात जागकर बिताई है। वे चन्द्रावली के घर में विहार करते रहे और मैं विरह की आग में जलती रही 'कृपालु'अपने लिये कहते हैं कि कृष्णपक्ष (श्यामसुन्दर के पक्ष) में चन्द्रावली (सखी का नाम) को देखकर अपने मन में आश्चर्य मत करो, अथवा कुष्णपक्ष ( अँधेरा पक्ष) में चन्द्रावली (चन्द्रमा के झुण्ड) को देखकर आश्चर्य मत करो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 658-659

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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