# लख्यो पिय, कुंज-भवन भननात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0703-M16-K050
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 50
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 330–330

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लख्यो पिय, कुंज-भवन भननात।  
<a id="line-2"></a>बड़ोइ भयानक कुंज-भवन लखि, मन-ही-मन डरपात।  
<a id="line-3"></a>प्रतिहारिनि चहुँ दिशि लखि डोलत, पूछत"सखि का बात"?।  
<a id="line-4"></a>एकहु सखि नहिं बात बतावति, तब औरहुँ घबरात।  
<a id="line-5"></a>दृगन झरत, सखि-पगन परत, अति, आरत"हा! हा"खात।  
<a id="line-6"></a>झटकि पटकि सब आँखि दिखावति, पिय व्याकुल बिलखात।  
<a id="line-7"></a>धाय “कृपालु” ललिहिं कह ललिता,"आये श्यामल गात"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(किशोरी जी की आज्ञा के अनुसार सखियों के पहरे हो जाने के पश्चात् श्यामसुन्दर के आने पर वहाँ की स्थिति का वर्णन।)। गण श्यामसुन्दर ने कुंज महल को अत्यन्त ही सुनसान देखा। अत्यन्त ही भयानक कुंजभवन को देखकर प्रियतम मन-ही-मन डरने लगे। महल के चारों ओर सखियों का पहरा देखकर उनसे पूछते हैं, 'अरी संखीं! आज क्या बात है? किन्तु जब कोई भी सखी कुछ भी उत्तर नहीं देती तब और भी घबड़ाने लगे। बार-बार अनेक सखिंयों के चरण पकड़ते हैं एवं उनके चरणों पर आँसू बहाते हैं तथा अत्यन्त ही कातर होकर हा हा खाते हैं किन्तु सखियाँ झटक करके आँखें दिखाती हुई दूर चली जाती हैं और प्रियतम वहीं खड़े-खड़े रोतें रहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इतने में ही दौड़कर ललिता ने किशोरी जी से कहा कि हे किशोरी जी! श्यामसुन्दर आ गये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 663-664

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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