# अली! यह मुरली बुरी बलाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0715-M17-K003
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मुरली-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 3
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 336–336

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अली! यह मुरली बुरी बलाय।  
<a id="line-2"></a>भई बावरी गोपिन डोलति, जनु कोउ मूठि चलाय।  
<a id="line-3"></a>कोउ धावति, कोउ दृग झरि लावति, कोउ करति मुख"हाय!"।  
<a id="line-4"></a>लोक-वेद-कुल-कानि-आनि-तिज, गई कोउ बौराय।  
<a id="line-5"></a>आनन धरे हिरन तृन कानन, नेकु न सकेउ चबाय।  
<a id="line-6"></a>शुक, सनकादि, शंभु आदिक जे, तेउ समाधि भुलाय।  
<a id="line-7"></a>बधिर “कृपालु” करत कत अचरज, जो न ठगोरी आय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक गोपी कहती है कि यह मुरली तो बुरी बला है। इसकी तान सुनकर समस्त ब्रज-गोपियाँ दीवानी-सी बनकर डोलती हैं। जैसे किसी ने इन पर जादू कर दिया हो। कोई गोपी भागती है, कोई घर से न निकल सकने के कारण आँसू बहाती है एवं कोई मुरली की तान सुनते ही अपने मुख से हाय! हाय!। कहती है। कोई तो लोक परलोक का ध्यान छोड़कर वास्तव में ही पागल हो जाती है। वन में मृग अपने मुख में घास रख कर न तो उसे चबा ही सकते हैं और न उगल ही सकते हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी शुकदेव, सनकादिक एवं शंकरादिक भी अपनी-अपनी समाधि भूल गये। 'कृपालु' कहते हैं कि तू बहरा होने के कारण यह आश्चर्य मत कर कि मैं तो मुरली की ठगाई में नहीं आया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 674

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
