मुरली-माधुरी · पद 9
श्याम तोरी, मुरली ने जुलुम करी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma! torī, muralī ne juluma karī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम तोरी, मुरली ने जुलुम करी।
2धुनि सोँ नर, किन्नर, सुर मोहे, शिव समाधि बिसरी।
3तुम जो रची वेद-मरजादा, सो सब खोय धरी।
4वंस-वंस वनवास, आठ-मुख, अंतर पोल परी।
5इतनेहुँ पै इतराति, निलज अति, नगन देह सिगरी।
6नहिं “कृपालु” कछु दोष बंसरी, मुँह लग कीन हरी॥
हिन्दी भावार्थ
एक गोपी कहती है कि हे श्यामसुन्दर! तुम्हारी मुरली ने तो बहुत ही ऊधम कर डाला है। इस मुरली की तान से नर, किन्नर, देवता आदि सभी अपने आप को भूल गये, यहाँ तक कि शंकरजी की निर्विकल्प समाधि भी भंग हो गई। हे श्यामसुन्दर! तुमने जो वेदों में मनुष्यों के लिए वर्णाश्रम व्यवस्था की मर्यादा बनाई थी, इस मुरली ने उसे बिल्कुल नष्ट कर दिया। यद्यपि इस मुरली का कुल बाँस का है एवं निवास जंगल का है, आठ छेद हैं, अन्तःकरण छूछा (पोला) है, स्वयं नंगी है, फिर भी यह निर्लज्ज हम सबको देखकर अत्यन्त ही इतराती है। 'कृपालु' कहते हैं कि इसमें वंशी का कोई दोष नहीं, दोष तो श्यामसुन्दर का है जिन्होंने इसको मुँह लगी करके ढीठ बना दिया है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 678-679