मिलन-माधुरी · पद 54
सखी! तू, काहे मोहिं छुपाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! tū, kāhe mohiṁ chhupāya?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! तू, काहे मोहिं छुपाय।
2हौं तो तोरी सगी सहेली, पुनि कत कहत लजाय।
3हौं गइ जान मान नहिं भल तू, दृगन-चोट गइ खाय।
4चितवनि गवनि हँसनि बतरावति, कोउ रसिया मन-भाय।
5कहु सखि! तेरो वो कैसो है?, रूप रंग कस वाय।
6कह “कृपालु” सखि! वो ऐसो है, जैसो है बलभाय॥
हिन्दी भावार्थ
(एक ब्रज-गोपी के श्यामसुन्दर-सम्बन्धी प्रेम का सखी द्वारा प्राकट्य) "अरी सखि! तू मुझसे क्यों छिपाती है? मैं तो तेरी सगी सखी हूँ, मुझसे बताने में क्या लज्जा है। ही न बताये और भले ही न माने, किन्तु मैं तो भली-भाँति जान गयी हूँ कि तू किसी प्रियतम के कटाक्ष से घायल हो चुकी है। तेरा रसमय देखना, चलना, हँसना, सिद्ध करता है कि तेरे मन में रसिया समा गया है। सच बता सखि! तेरा 'वरो'कैसा है? उसका रूप-रंग कैसा है? 'कृपालु' के शब्दों में सखी उत्तर देती है-अरी सखि! वे ऐसे हैं जैसे श्यामसुन्दर हैं। समान श्यामसुन्दर ही हो सकते हैं, अतएव स्वतः सिद्ध हो गया कि इस सखी के प्रियतम श्यामसुन्दर ही हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 605-606