मिलन-माधुरी · पद 55
सखी! मैं, गिरिधर हाथ बिकानी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! maiṁ, giridhara hātha bikānī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! मैं, गिरिधर हाथ बिकानी।
2पी बिनु मोल अमोल-मधुर-मधु, भइ पिय प्रेम दिवानी।
3छकी पिया-रस-रूप-माधुरी, लोग कहें बौरानी।
4रोम रोम रमि रह्यो श्याम-रस, सुधि-बुधि देह भुलानी।
5तृण सम डारि वेद-मर्यादा, लोक-लाज कुल-कानी।
6पिय “कृपालु” सखि! हरि-रस-मदिरा, करति सदा मनमानी॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन, एवं उसका एक सखी से कहना।) अरी सखी! आज तो मैं प्यारे श्यामसुन्दर के हाथ सदा के लिए बिक गई। बिना मूल्य दिये ही अमूल्य मधुर प्रेम-मदिरा को पीकर प्रियतम के प्रेम में उन्मत्त हो गई। मुझे प्रियतम को रूप-माधुरी में दीवानी देखकर लोग पगली कहते हैं। अरी सखी! मेरे रोम-रोम में श्याम रस समा गया है। मुझे अपने शरीर की बिल्कुल भी सुधि-बुधि नहीं रहती है। लोक-लाज बंश की मर्यादा एवं वेद की आज्ञाओं को भी मैंने तृण के समान फेंक दिया है। "कृपालु 'अपने लिए कहते हैं कि तू भी इस प्रेम रस-मदिरा का पान किया कर, सदा को अपनी मनमानी को छोड़ दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 606