# सखी! मैं, गिरिधर हाथ बिकानी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0638-M15-K055
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 55
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 300–300

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! मैं, गिरिधर हाथ बिकानी।  
<a id="line-2"></a>पी बिनु मोल अमोल-मधुर-मधु, भइ पिय प्रेम दिवानी।  
<a id="line-3"></a>छकी पिया-रस-रूप-माधुरी, लोग कहें बौरानी।  
<a id="line-4"></a>रोम रोम रमि रह्यो श्याम-रस, सुधि-बुधि देह भुलानी।  
<a id="line-5"></a>तृण सम डारि वेद-मर्यादा, लोक-लाज कुल-कानी।  
<a id="line-6"></a>पिय “कृपालु” सखि! हरि-रस-मदिरा, करति सदा मनमानी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन, एवं उसका एक सखी से कहना।) अरी सखी! आज तो मैं प्यारे श्यामसुन्दर के हाथ सदा के लिए बिक गई। बिना मूल्य दिये ही अमूल्य मधुर प्रेम-मदिरा को पीकर प्रियतम के प्रेम में उन्मत्त हो गई। मुझे प्रियतम को रूप-माधुरी में दीवानी देखकर लोग पगली कहते हैं। अरी सखी! मेरे रोम-रोम में श्याम रस समा गया है। मुझे अपने शरीर की बिल्कुल भी सुधि-बुधि नहीं रहती है। लोक-लाज बंश की मर्यादा एवं वेद की आज्ञाओं को भी मैंने तृण के समान फेंक दिया है। "कृपालु 'अपने लिए कहते हैं कि तू भी इस प्रेम रस-मदिरा का पान किया कर, सदा को अपनी मनमानी को छोड़ दे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 606

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
