मिलन-माधुरी · पद 53
सखी! क्यों, निज पिय पै इतराय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! kyoṁ, nija piya pai itarāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! क्यों, निज पिय पै इतराय।
2जैसो है मेरो पिय तैसो, तेरो होइ न सकाय।
3अरी वीर! तू का जाने जस, मेरो प्रियतम आय।
4नेकु बताउ नाउँ वाको सखि!, जाको अस गुन गाय।
5प्रथम बताउ तु ही निज पिय सखि!, जेहि बढ़ि-बढ़ि बतराय।
6कह “कृपालु” हौं बतराऊँ सखि!, दोउन पिय बलभाय॥
हिन्दी भावार्थ
(एक श्री कृष्ण प्रेयसी से उसको सखी को विनोदमयी वार्ता) सखि! तू अपने प्रियतम पर इतना गुमान क्यों करती है? जैसा मेरा प्रियतम है वैसा तेरा प्रियतम स्वप्न में भी नहीं हो सकता। सखी ने उत्तर दिया -''अरी सखि! प्रियतम के समान तो मेरा ही प्रियतम है''। किया- "अच्छा सखि! बढ़ाकर गा रही है, तनिक उसका नाम तो बता? उत्तर दिया-'अपने जिस प्रियतम के विषय में तू बढ़-बढ़ कर बातें कर रही है पहिले तू ही उसका नाम बता''। कृपालु' ने कहा जब दोनों के प्रियतम के समान दोनों के ही प्रियतम हैं तब दोनों के प्रियतम के नाम को मैं बता सकता हूँ और वह नाम है, गोपीजन-वल्लभ श्यामसुन्दर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 604-605