मिलन-माधुरी · पद 52
सखी! इक, सपनो देख्योँ रात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ika, sapano dekhyoṁ rāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! इक, सपनो देख्योँ रात।
2वंशीवट तट-तरणि-तनूजा, हौं इकली रहि जात।
3औचक लख्योँ एक तहँ ढोटा, सुंदर श्यामलगात।
4पियरो पट, कटि काछनि काछे, मोर मुकुट बल खात।
5कर मुरली, गल-गुंजमाल भल, गति सोँ हंस लजात।
6अति रसभरे नैन रतनारे, कजरारे मदमात।
7कटि किंकिनि, पग पायल सोहति, मन मोहत मुसकात।
8कहँ लौं कह सखि! रूप-माधुरी, कोटि काम सकुचात।
9लखतहिं हौं सखि! भइ वश ताके, बड़ी बुरी यह बात।
10यह “कृपालु” कछु भेद अलौकिक, जग न होत अस नात॥
हिन्दी भावार्थ
(श्री वृषभानुनन्दिनी राधा का श्यामसुन्दर से प्रथम श्री राधिका जी अपनी किसी अन्तरंग सखी से कहती हैं कि हे सखी! आज रात में मैंने एक स्वप्न देखा है। वह यह है कि मैं बंशीवट पर यमुना के किनारे अकेली जा रही थी। जाते हुए ही अत्यन्त सुन्दर श्याम रंग का अचानक ही एक बालक देखा, जो पीताम्बर पहने हुए था, कमर में काछनी बाँधे हुए था। एवं सिर पर झूमता हुआ मयूर-पंखों का मुकुट धारण किये हुए था। हाथ में मुरली एवं गले में गुँजों की माला पहने हुए था। तथा हंसों को भी लजाने वाली अत्यन्त मतवाली चाल से चल रहा था। उसकी आँखें अत्यन्त ही मतवाली एवं प्रेम रस से भरी हुई थीं। आँखों में स्वाभाविक ही काजल-सा लगा हुआ था। कमर में करधनी एवं पैरों में नूपुर सुशोभित हो रहे थे एवं मुस्कराते हुए हठात् मन को मुग्ध कर रहा था। अरी सखी! उसके रूप माधुर्य का कहाँ तक वर्णन करूँ करोड़ों कामदेव भी फीके लगते थे। अरी सखी! उसके देखते ही मैं उसके वश में हो गई किन्तु यह अत्यन्त ही बुरी बात है। 'कपालु'कहते हैं कि यह कुछ लोकातीत रहस्य है क्योंकि संसार में किसी का किसी से प्रेम स्वप्नावस्था में नहीं हुआ करता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 603-604