# सखी! इक, सपनो देख्योँ रात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0635-M15-K052
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 52
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 298–299

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! इक, सपनो देख्योँ रात।  
<a id="line-2"></a>वंशीवट तट-तरणि-तनूजा, हौं इकली रहि जात।  
<a id="line-3"></a>औचक लख्योँ एक तहँ ढोटा, सुंदर श्यामलगात।  
<a id="line-4"></a>पियरो पट, कटि काछनि काछे, मोर मुकुट बल खात।  
<a id="line-5"></a>कर मुरली, गल-गुंजमाल भल, गति सोँ हंस लजात।  
<a id="line-6"></a>अति रसभरे नैन रतनारे, कजरारे मदमात।  
<a id="line-7"></a>कटि किंकिनि, पग पायल सोहति, मन मोहत मुसकात।  
<a id="line-8"></a>कहँ लौं कह सखि! रूप-माधुरी, कोटि काम सकुचात।  
<a id="line-9"></a>लखतहिं हौं सखि! भइ वश ताके, बड़ी बुरी यह बात।  
<a id="line-10"></a>यह “कृपालु” कछु भेद अलौकिक, जग न होत अस नात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्री वृषभानुनन्दिनी राधा का श्यामसुन्दर से प्रथम श्री राधिका जी अपनी किसी अन्तरंग सखी से कहती हैं कि हे सखी! आज रात में मैंने एक स्वप्न देखा है। वह यह है कि मैं बंशीवट पर यमुना के किनारे अकेली जा रही थी। जाते हुए ही अत्यन्त सुन्दर श्याम रंग का अचानक ही एक बालक देखा, जो पीताम्बर पहने हुए था, कमर में काछनी बाँधे हुए था। एवं सिर पर झूमता हुआ मयूर-पंखों का मुकुट धारण किये हुए था। हाथ में मुरली एवं गले में गुँजों की माला पहने हुए था। तथा हंसों को भी लजाने वाली अत्यन्त मतवाली चाल से चल रहा था। उसकी आँखें अत्यन्त ही मतवाली एवं प्रेम रस से भरी हुई थीं। आँखों में स्वाभाविक ही काजल-सा लगा हुआ था। कमर में करधनी एवं पैरों में नूपुर सुशोभित हो रहे थे एवं मुस्कराते हुए हठात् मन को मुग्ध कर रहा था। अरी सखी! उसके रूप माधुर्य का कहाँ तक वर्णन करूँ करोड़ों कामदेव भी फीके लगते थे। अरी सखी! उसके देखते ही मैं उसके वश में हो गई किन्तु यह अत्यन्त ही बुरी बात है। 'कपालु'कहते हैं कि यह कुछ लोकातीत रहस्य है क्योंकि संसार में किसी का किसी से प्रेम स्वप्नावस्था में नहीं हुआ करता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 603-604

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
