मिलन-माधुरी · पद 51
सखी! हरि,"छू-मंतर"सों करि गयो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhi! hari, ‘chhū-mantara’ soṁ kari gayo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! हरि,"छू-मंतर"सों करि गयो।
2हौं जमुना जल भरन गई रहि,
3सखि! हरि तहँ किरिकिरि सों परि गयो।
4दुहुँन दृगन मिलि कछु बतराये,
5सखि! हरि तुरतहिं हिय सोँ हरि गयो।
6अब दिन-रैन चैन नहिं कैसेहुँ,
7सखि! हरि नैननि जल सोँ भरि गयो।
8पलक लखात कलप जनु उन बिन,
9सखि! हरि विरह शैल सोँ धरि गयो।
10तुम “कृपालु” मूरख, लखि विरहिनि,
11सखि! हरि प्रीति जुरन सों डरि गयो॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का प्रियतम श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन, एवं उसका अपनी अन्तरंग सखी से कहना।) अरी सखी! आज तो श्यामसुन्दर मेरे ऊपर कुछ जादू पढ़कर मोहनमंत्र के द्वारा छूमन्तर-सा कर गये। मैं यमुना में पानी भरने गई थी। अरी सखी! वहीं पर श्यामसुन्दर मेरी आँखों में किरकिरी-सी बनकर पड़ गये (किरकिरी से अभिप्राय है अत्यन्त छोटा-सा कंकड़ का टुकड़ा)। इसके पश्चात् हमारी आँखों ने उनकी आँखों से मिलकर कुछ बातें कीं। अरी सखी! बातें करते ही श्यामसुन्दर ने मेरा मन चुरा लिया। अब दिन शत एक क्षण के लिए भी किसी भी प्रकार से चैन नहीं है। हज सखी! बे श्यामसुन्दर तो मेरी आँखों में सदा के लिए आँसुओं का जल-सा भर गये। अब उनके बिना एक क्षण भी हमारे लिए कल्प के समान भारी बन गया है। अरी सखी! वह छलिया तो मेरे हृदय के ऊपर विरह का पर्वत-सा रख गया है। विरहिणी की उपर्युक्त बहिरंग दुःखद अवस्थाओं को देखकर कृपालु'अपने लिए कहते हैं कि तुम अत्यंत ही मूर्ख हो जो विरहिणी को देखकर श्यामसुन्दर से प्रेम करने में डर गये। उस विरह में मिलन का कितना अपार आनन्द है, इसे पूर्ण रूप से विरहिणी ही अनुभव करती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 602-603