मिलन-माधुरी · पद 50
सखी! पिय-मुसकनि मन भा-गई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhi! piya-musakani mana bhā-gaī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! पिय-मुसकनि मन भा-गई।
2बची रही अब लौँ पै आजुहिं, औचक धोखा खा गई।
3सखिन संग उत्तुंग तरंगनि, देखन हौं यमुना गई।
4तहँ इक सखि कह इक अस मुसकनि, को अस जो बचि आ गई।
5हौं बोली"तू भोरी जो री, पतिव्रत दाग लगा गई"।
6इतनेइ महँ मुसकात आय पिय, लखि दोउ लोक गमा गई।
7कह “कृपालु” यह अस मुसकनि जहँ, शंभु-समाधि समा गई॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का श्याम-मिलन-सम्बन्धी कृतान्त अरी सखी! प्रियतम की मुस्कान देखकर मन मुग्ध हो गया। अब तक मैं बची थी। आज ही अचानक धोखा खा गई मैं सखियों के साथ यमुना की तरँगों को देखने गई थी। वही एक सखी ने चुनौती दी कि एक ऐसी मुस्कान है जिसे देखकर कोई भी अपने आप को नहीं सँभाल सकती। मैंने कहा तू भोली थी जो पतिव्रत- धर्म में कलंक लगा दिया '। इतने में ही मुस्कराते हुए श्यामसुन्दर आ गये और उनकी मुस्कान को देखते ही मैं लोक-परलोक खो बैठी। 'कृपालु' कहते हैं क! तेरी तो हैसियत ही क्या है इस मुस्कान में तो भगवान् शंकर की समाधि भी समा चुकी है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 601-602