मिलन-माधुरी · पद 49
लूटि मोहिं लै गयो नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lūṭi mohiṁ lai gayo nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लूटि मोहिं लै गयो नंदकुमार।
2यमुना-पुलिन, अलिन-सँग हौं गइ, ह्वै गये नैना चार।
3नैनन-नैनन बात भई कछु, कै गयो कछु रिझवार।
4मधुर-मिलन-रस प्याय हाय! अब, दै गयो विरह अपार।
5हौं भूली सुधि-बुधि तब कर गहि, लै गयो कुंज मझार।
6अब “कृपालु” जनि कहिय जानि गइ, बै गयो बीजहिं प्यार॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम-मिलन एवं उसका अपने-आपसे कहना।) आज उस नंद के कुमार ने मेरा तन, मन, धन सर्वस्व छीन लिया। मैं सखियों के संग यमुना के किनारे गई थी। वहीँ उसकी आँखों से मेरी आँखें मिल गईं एवं आँखों-आँखों से ही संकेत में कुछ बातें हुई तथा वह छलिया तत्क्षण ही मेरे ऊपर कुछ जादू-सा कर गया। उपर्युक्त मधुर-मिलन का रस पिलाकर हाय! हाय!! अब वह मुझे असह्य वियोग प्रदान कर गया। मैं में जब व्याकुल हो गई एवं उसकी रूपमाधुरी का ध्यान करते हुए अपनी सुधि-बुधि खो बैठी, तब वह छलिया मुझे बेसुध अवस्था में ही हाथ पकड़कर लताओं के कुंज की ओर ले गया। 'कृपालु' कहते हैं कि बस-बस अब आगे मत कहो, मैं समझ गई, वह तुम्हारे हृदय में वास्तविक विशुद्ध प्रेम का बीज बो गया। तुम धन्य हो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 600-601