# लूटि मोहिं लै गयो नंदकुमार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0632-M15-K049
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 49
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 296–297

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लूटि मोहिं लै गयो नंदकुमार।  
<a id="line-2"></a>यमुना-पुलिन, अलिन-सँग हौं गइ, ह्वै गये नैना चार।  
<a id="line-3"></a>नैनन-नैनन बात भई कछु, कै गयो कछु रिझवार।  
<a id="line-4"></a>मधुर-मिलन-रस प्याय हाय! अब, दै गयो विरह अपार।  
<a id="line-5"></a>हौं भूली सुधि-बुधि तब कर गहि, लै गयो कुंज मझार।  
<a id="line-6"></a>अब “कृपालु” जनि कहिय जानि गइ, बै गयो बीजहिं प्यार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम-मिलन एवं उसका अपने-आपसे कहना।) आज उस नंद के कुमार ने मेरा तन, मन, धन सर्वस्व छीन लिया। मैं सखियों के संग यमुना के किनारे गई थी। वहीँ उसकी आँखों से मेरी आँखें मिल गईं एवं आँखों-आँखों से ही संकेत में कुछ बातें हुई तथा वह छलिया तत्क्षण ही मेरे ऊपर कुछ जादू-सा कर गया। उपर्युक्त मधुर-मिलन का रस पिलाकर हाय! हाय!! अब वह मुझे असह्य वियोग प्रदान कर गया। मैं में जब व्याकुल हो गई एवं उसकी रूपमाधुरी का ध्यान करते हुए अपनी सुधि-बुधि खो बैठी, तब वह छलिया मुझे बेसुध अवस्था में ही हाथ पकड़कर लताओं के कुंज की ओर ले गया। 'कृपालु' कहते हैं कि बस-बस अब आगे मत कहो, मैं समझ गई, वह तुम्हारे हृदय में वास्तविक विशुद्ध प्रेम का बीज बो गया। तुम धन्य हो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 600-601

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
