मिलन-माधुरी · पद 48
लखी मैं सखि! सुंदर श्याम सुजान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhī maiṁ sakhi! sundara shyāma sujāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखी मैं सखि! सुंदर श्याम सुजान।
2जमुना पुलिन अलिन सँग हिलिमिलि, गई करन असनान।
3ललित लवंग लता कुंजन ते, प्रकट्यो औचक कान्ह।
4सान धरे सैनन उर, सो तकि, मार्यो नैनन बान।
5छूमंतर सोँ करि उर अंतर, दुरि गयो कुंज लतान।
6घायल करि “कृपालु” ललिता कहँ, टेर्यो मुरलिहिं तान॥
हिन्दी भावार्थ
ल एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है- मैंने परम सुन्दर श्यामसुन्दर को देख लिया। मैं सखियों के साथ हिल-मिल कर यमुना के तट पर स्नान करने गयी थी। श्यामसुन्दर अचानक सुन्दर लवंग को लताओं के मंडप से बरही आ गये, उन्होंने अत्यन्त नुकीले नैनों के कटाक्ष बाण से हृदय में 'प्रहार किया। बाण लगते ही मेरे ऊपर जादू सा हो गया। इतने में ही उन्होंने मुरली की तान छेड़ दी। 'कृपालु' के शब्दों में इस प्रकार मुझे घायल करके वे पुन: उसी लवंग लता कुंज में छुप गये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 599-600