मिलन-माधुरी · पद 47
लखी इन, नैनन मृदु-मुसकान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhī ina, nainana mṛidu-musakāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखी इन, नैनन मृदु-मुसकान।
2बिसरि गई तनु की सुधि सिगरी, लखतहिं श्याम सुजान।
3भाज गई सब साज बाज लै, लोक लाज कुल कान।
4जब जित देखूँ तब तित दीखत,सोइ मुसकान न आन।
5नैन न रसना, रसना नैन न, केहि विधि करौं बखान।
6अब “कृपालु” इक काम याम वसु, श्याम-नाम-गुन-गान॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है मैंने अपनी आँखों से श्यामसुन्दर की मधुर मुस्कान देखी है। देखते ही शरीर की सुधिबुधि भूल गयी एवं लोक वेद की, कुल की लज्जा अपने साज-बाज के साथ भाग गयी। जिधर देखती हूँ उधर ही केवल वही मधुर मुस्कान दीखती है। जिन आँखों ने देखा है उनके वाणी नहीं है एवं वाणी के आँख नहीं है। अतएव उस मुस्कान माधुरी का वर्णन नहीं कर सकती। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि अब तो दिन-रात यही एक काम रह गया है कि श्यामसुन्दर के नाम एवं उनके गुणों का गान किया करूँ!
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 599