मिलन-माधुरी · पद 46
लखी इन, नैनन नैनन कान्ह।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhī ina, nainana nainana kānha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखी इन, नैनन नैनन कान्ह।
2नैनन बैन न नैन न बैनन, सैनन सोँ बतरान।
3लवण-डली जिमि जल मिलि तिमि भइ, घुलमिल एक समान।
4चंचल ते चंचल ते मिलि मन, चंचलताहुँ भुलान।
5सुधि बुधि बुधि सुधि सब विधि भूली, इंद्रजाल उनमान।
6कह “कृपालु” तू आजुहिं फूली, कल मिल फल जिय जान॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है कि आज मेरी आँखों ने श्यामसुन्दर की आँखों को देखा। आँखों के वाणी तो है नहीं सांकेतिक वाणी से ही श्यामसुन्दर की आँखों से बात की एवं जिस प्रकार नमक डली जल में मिल जाती है, उसी प्रकार मेरी आँखें भी श्यामसुन्दर की आँखों में घुलमिल कर एक हो गयीं। मूर्तिमान चान्चल्य से भी अधिक चंचल श्यामसुन्दर से मिलकर मन भी अपनी चंचलता भूल गया। बुद्धि भी अपनी निश्चयात्मिका क्रिया की सुध-बुध सभी प्रकार से भूल गयी। इन्द्रजाल सरीखी स्थिति हो गयी। 'कृपालु' कहता है अरी सखि! तू आज ही फूली-फूली फिर रही है किन्तु जब कल वियोग मिलेगा तब फल का अनुभव होगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 598