मिलन-माधुरी · पद 45
लखि आजु गई बलिहार रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhi āju gaī balihāra re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखि आजु गई बलिहार रे।
2लतन कुंज ठाढ़ो टेढ़ो ह्वै, नागर-नंदकुमार रे।
3मंद-मंद-मुसकाय लख्यो मोहिं, हौं हूँ ताहि निहार रे।
4चितवत पलक चलत लखि रिस भइ, ब्रह्मा निपट गमार रे।
5उन कछु कह्यो न हौं कछु बोली, सुधि बुधि देह बिसार रे।
6कह “कृपालु” सखि! नहिं कछु अचरज, द्वै-द्वै मिलि ह्वै चार रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है कि मैं आज श्यामसुन्दर को देखकर बलिहार गयी। चे लताओं के कुंज में तीन स्थान से टेढ़े होकर खड़े थे। उन्होंने मन्द-मन्द मुस्कराते हुए मुझे देखा और मैंने भी उन्हें देखा। देखते समय बार-बार पलकों के क से मुझे अपार दुःख हुआ और मैंने सोचा कि ब्रह्मा घोर मूर्ख है जो उसने आँखों में पलकें बना दीं। अस्तु, न उन्होंने मुझसे कुछ कहा, न मैंने ही उनसे कुछ कहा, फिर भी शरीर की सुधिबुधि खो बैठी। इतने में ही 'कृपालु' ने कहा-अरी सखि! यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, दो और दो नेत्र मिलकर चार हो गए हमारे लोक में भी दो दो मिलकर चार ही होते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 597-598