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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 44

यह यारी है, हाय या बटमारी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha yārī hai, hāya yā baṭamārī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1यह यारी है, हाय या बटमारी।

2मोते कही सखी! टुक देखूँ, तव आँखिन लाग्यो का री।

3हौं अनजानी मरम न जानी, लखतहिं नैन-सैन मारी।

4कहा कहूँ पुनि भयो कहा सखि! अहा! अहा! कहि मन हारी।

5अब तो कमल-नैन देखे बिनु, चारिहुँ मुक्ति लगति खारी।

6कह “कृपालु” बिनु हेतु सनेही, यह साँचो पिय बनवारी॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी का श्यामसुन्दर से प्रथम मिलन एवं अपनी अन्तरंग सखी से उसका निरूपण-) अरी सखि! यह प्रीति की रीति है अथवा डकैती की अनरीति है, आज श्यामसुन्दर ने मुझसे कहा-' अरी सखि! जरा देखूँ तो तेरी आँखों में क्या लगा है?''मैं भोली-भाली उसकी चालाकी को न समझ सकी। मैंने अपनी आँखें खोलकर जैसे ही उसे देखा उसने अपनी आँखों में अलौकिक प्यार भर कर मेरी आँखों में उड़ेल दिया। अरी सखि! फिर क्या बताऊँ आगे क्या हुआ। बस! प्रेम-विभोर होकर बरबस मन खो बैठी। अब तो उन पुण्डरीकाक्ष श्यामसुन्दर के बिना देखे चारों मुक्तियों का सुख भी खारा लगता है। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! इस डकैती का रहस्य यह है कि श्यामसुन्दर समस्त जीवों के एक मात्र प्रियतम हैं एवं अकारण-प्रेमी हैं, अतएव हठात् प्रेमदान करते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 596-597