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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 43

यह कैसी लागि बलाय रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha kaisī lāgi balāya re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1यह कैसी लागि बलाय रे।

2कालि गई वंशीवट पनघट, आयो तहँ बलभाय रे।

3जाकी लखि सखि! रूप-माधुरी, आपुहिं आपु गमाय रे।

4दृग सोँ निकसति सलिल-धार अरु, मुख सों निकसति"हाय"रे।

5सुक, पिक, मोर, पपिहरा सिगरेइ, मिलि जनु मारन धाय रे।

6कहँ लौ कहिय “कृपालु” दशा तनु, साँसहि आवे जाय रे॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है अरी वीर! यह कौन-सी बलाय पीछे लग गयी। मैं कल बंशीवट पानी भरने गयी थी। वहीं पर बलदाऊ का भैया कन्हैया आ गया। उसकी सौन्दर्य माधुरी को देखकर मैंने अपने आप को खो दिया। अब तो आँखों से एकमात्र आँसू एवं मुख से एकमात्र हाय-हाय ही निकल रही है। तोते, कोयल, मोर, चातक आदि सब के सब जैसे मुझे मारने के लिए दौड़ पड़े हैं। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि अपने शरीर की अवस्था का क्या वर्णन करूँ एक साँस ही शेष है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 596