# यह कैसी लागि बलाय रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0626-M15-K043
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 43
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 294–294

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>यह कैसी लागि बलाय रे।  
<a id="line-2"></a>कालि गई वंशीवट पनघट, आयो तहँ बलभाय रे।  
<a id="line-3"></a>जाकी लखि सखि! रूप-माधुरी, आपुहिं आपु गमाय रे।  
<a id="line-4"></a>दृग सोँ निकसति सलिल-धार अरु, मुख सों निकसति"हाय"रे।  
<a id="line-5"></a>सुक, पिक, मोर, पपिहरा सिगरेइ, मिलि जनु मारन धाय रे।  
<a id="line-6"></a>कहँ लौ कहिय “कृपालु” दशा तनु, साँसहि आवे जाय रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है अरी वीर! यह कौन-सी बलाय पीछे लग गयी। मैं कल बंशीवट पानी भरने गयी थी। वहीं पर बलदाऊ का भैया कन्हैया आ गया। उसकी सौन्दर्य माधुरी को देखकर मैंने अपने आप को खो दिया। अब तो आँखों से एकमात्र आँसू एवं मुख से एकमात्र हाय-हाय ही निकल रही है। तोते, कोयल, मोर, चातक आदि सब के सब जैसे मुझे मारने के लिए दौड़ पड़े हैं। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि अपने शरीर की अवस्था का क्या वर्णन करूँ एक साँस ही शेष है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 596

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
