मिलन-माधुरी · पद 42
यमुन तट, गई भरन घट आज।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yamuna taṭa, gaī bharana ghaṭa āja
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1यमुन तट, गई भरन घट आज।
2कहा कहूँ सखि तहँइ ठड़ो रह, ठगहारन-सरताज।
3मोहिं लखि तान मधुर-मुरली की, छेड़ दई ब्रजराज।
4सुनत रसीली तान सखी मम, गिरी शीश जनु गाज।
5बैठि गई इत, उर धरि कर, उत, हरि गयो कुंजन भाज।
6तलफति हौं “कृपालु” इत पल-पल, लरत प्रीति उत लाज॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! मैं आज यमुना के किनारे घड़ा भरने गयी थी। क्या बताऊँ, वहीं पर ठगों का सरताज ब्रजराज खड़ा था। मुझको देखते ही उसने सुरीली मुरली की तान छेड़ दी। जिसको सुनते ही मेरी ऐसी दशा हो गयी जैसे कि वज्रपात हो गया हो। इधर तो मैं हृदय को थाम कर वहीं बैठ गयी। उधर वह नटखट लताओं में चला गया। 'कृपालु' के शब्दों में अब मेरी ऐसी स्थिति है कि एक ओर तो मैं विरह में प्रतिक्षण तड़प रही हूँ दूसरी ओर प्रेम एवं लज्जा में युद्ध हो रहा है। (प्रेम लज्जा से कहता है कि अब मैं आ गया तुम चली जाओ; लज्जा कहती है-मैं तो अनादिकाल की संगिनी हूँ, तुम्हीं चले जाओ)।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 595