मिलन-माधुरी · पद 41
मोहि लियो, मो मन मदन गोपाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mohi liyo, mo mana madana gopāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मोहि लियो, मो मन मदन गोपाल।
2देखत ही छवि भई बावरी, ललित-त्रिभंगी लाल।
3कासों, केहि विधि, कहा कहूँ अब, सब हँसिहैं दै ताल।
4दोउ नैना धैना करि बैठे, मैं ना समझी चाल।
5टोना सों कछु कै गयो मो पै, भई हाल बेहाल।
6तुम “कृपालु” निज भाग सराहिय, फँसे न जो येहि जाल॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन, एवं उसका अपने-आप से कहना।) हाय! हाय!! आज तो मदनमोहन ने मेरा मन ही मोहित कर लिया। मैं उनकी तीन जगह से टेढ़ी अनुपम रूप-माधुरी को देखते ही पागल-सी हो गई। अब यह बात भला किस प्रकार एवं किससे कहूँ? यदि कहूँ तो भी सुनने वाले ताली बजा बजाकर मेरी हँसी उड़ायेंगे। ये मेरी दोनों आँखें बिना मुझसे पूछे ही उनसे छेड़-छाड़ कर बैठीं। मैं भोली-भाली इन आँखों चाल को बिल्कुल ही न समझ सकी। देखते ही उसने मेरे ऊपर कुछ जादू-सा कर दिया एवं मैं तत्क्षण ही अपनी सुधि बुधि खो बैठी। अब मैं प्रियतम से मिलने के लिए अत्यन्त ही व्याकुल हूँ। 'कृपालु'अपने लिए कहते हैं कि हे कृपालु तुम अपने भाग्य की भूरि-भूरि सराहना करो जो उस छलिया के रूप-सौन्दर्य के जाल में नहीं पड़े, अन्यथा तुम्हारा भी हाल उपर्युक्त गोपी की भाँति ही होता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 594-595