# मोहि लियो, मो मन मदन गोपाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0624-M15-K041
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 41
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 293–293

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मोहि लियो, मो मन मदन गोपाल।  
<a id="line-2"></a>देखत ही छवि भई बावरी, ललित-त्रिभंगी लाल।  
<a id="line-3"></a>कासों, केहि विधि, कहा कहूँ अब, सब हँसिहैं दै ताल।  
<a id="line-4"></a>दोउ नैना धैना करि बैठे, मैं ना समझी चाल।  
<a id="line-5"></a>टोना सों कछु कै गयो मो पै, भई हाल बेहाल।  
<a id="line-6"></a>तुम “कृपालु” निज भाग सराहिय, फँसे न जो येहि जाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन, एवं उसका अपने-आप से कहना।) हाय! हाय!! आज तो मदनमोहन ने मेरा मन ही मोहित कर लिया। मैं उनकी तीन जगह से टेढ़ी अनुपम रूप-माधुरी को देखते ही पागल-सी हो गई। अब यह बात भला किस प्रकार एवं किससे कहूँ? यदि कहूँ तो भी सुनने वाले ताली बजा बजाकर मेरी हँसी उड़ायेंगे। ये मेरी दोनों आँखें बिना मुझसे पूछे ही उनसे छेड़-छाड़ कर बैठीं। मैं भोली-भाली इन आँखों चाल को बिल्कुल ही न समझ सकी। देखते ही उसने मेरे ऊपर कुछ जादू-सा कर दिया एवं मैं तत्क्षण ही अपनी सुधि बुधि खो बैठी। अब मैं प्रियतम से मिलने के लिए अत्यन्त ही व्याकुल हूँ। 'कृपालु'अपने लिए कहते हैं कि हे कृपालु तुम अपने भाग्य की भूरि-भूरि सराहना करो जो उस छलिया के रूप-सौन्दर्य के जाल में नहीं पड़े, अन्यथा तुम्हारा भी हाल उपर्युक्त गोपी की भाँति ही होता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 594-595

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
