# सखी! पिय-मुसकनि मन भा-गई।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0633-M15-K050
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 50
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 297–297

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! पिय-मुसकनि मन भा-गई।  
<a id="line-2"></a>बची रही अब लौँ पै आजुहिं, औचक धोखा खा गई।  
<a id="line-3"></a>सखिन संग उत्तुंग तरंगनि, देखन हौं यमुना गई।  
<a id="line-4"></a>तहँ इक सखि कह इक अस मुसकनि, को अस जो बचि आ गई।  
<a id="line-5"></a>हौं बोली"तू भोरी जो री, पतिव्रत दाग लगा गई"।  
<a id="line-6"></a>इतनेइ महँ मुसकात आय पिय, लखि दोउ लोक गमा गई।  
<a id="line-7"></a>कह “कृपालु” यह अस मुसकनि जहँ, शंभु-समाधि समा गई॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का श्याम-मिलन-सम्बन्धी कृतान्त अरी सखी! प्रियतम की मुस्कान देखकर मन मुग्ध हो गया। अब तक मैं बची थी। आज ही अचानक धोखा खा गई मैं सखियों के साथ यमुना की तरँगों को देखने गई थी। वही एक सखी ने चुनौती दी कि एक ऐसी मुस्कान है जिसे देखकर कोई भी अपने आप को नहीं सँभाल सकती। मैंने कहा तू भोली थी जो पतिव्रत- धर्म में कलंक लगा दिया '। इतने में ही मुस्कराते हुए श्यामसुन्दर आ गये और उनकी मुस्कान को देखते ही मैं लोक-परलोक खो बैठी। 'कृपालु' कहते हैं क! तेरी तो हैसियत ही क्या है इस मुस्कान में तो भगवान् शंकर की समाधि भी समा चुकी है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 601-602

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
