# सखी! हरि,"छू-मंतर"सों करि गयो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0634-M15-K051
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 51
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 297–298

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! हरि,"छू-मंतर"सों करि गयो।  
<a id="line-2"></a>हौं जमुना जल भरन गई रहि,  
<a id="line-3"></a>सखि! हरि तहँ किरिकिरि सों परि गयो।  
<a id="line-4"></a>दुहुँन दृगन मिलि कछु बतराये,  
<a id="line-5"></a>सखि! हरि तुरतहिं हिय सोँ हरि गयो।  
<a id="line-6"></a>अब दिन-रैन चैन नहिं कैसेहुँ,  
<a id="line-7"></a>सखि! हरि नैननि जल सोँ भरि गयो।  
<a id="line-8"></a>पलक लखात कलप जनु उन बिन,  
<a id="line-9"></a>सखि! हरि विरह शैल सोँ धरि गयो।  
<a id="line-10"></a>तुम “कृपालु” मूरख, लखि विरहिनि,  
<a id="line-11"></a>सखि! हरि प्रीति जुरन सों डरि गयो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का प्रियतम श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन, एवं उसका अपनी अन्तरंग सखी से कहना।) अरी सखी! आज तो श्यामसुन्दर मेरे ऊपर कुछ जादू पढ़कर मोहनमंत्र के द्वारा छूमन्तर-सा कर गये। मैं यमुना में पानी भरने गई थी। अरी सखी! वहीं पर श्यामसुन्दर मेरी आँखों में किरकिरी-सी बनकर पड़ गये (किरकिरी से अभिप्राय है अत्यन्त छोटा-सा कंकड़ का टुकड़ा)। इसके पश्चात् हमारी आँखों ने उनकी आँखों से मिलकर कुछ बातें कीं। अरी सखी! बातें करते ही श्यामसुन्दर ने मेरा मन चुरा लिया। अब दिन शत एक क्षण के लिए भी किसी भी प्रकार से चैन नहीं है। हज सखी! बे श्यामसुन्दर तो मेरी आँखों में सदा के लिए आँसुओं का जल-सा भर गये। अब उनके बिना एक क्षण भी हमारे लिए कल्प के समान भारी बन गया है। अरी सखी! वह छलिया तो मेरे हृदय के ऊपर विरह का पर्वत-सा रख गया है। विरहिणी की उपर्युक्त बहिरंग दुःखद अवस्थाओं को देखकर कृपालु'अपने लिए कहते हैं कि तुम अत्यंत ही मूर्ख हो जो विरहिणी को देखकर श्यामसुन्दर से प्रेम करने में डर गये। उस विरह में मिलन का कितना अपार आनन्द है, इसे पूर्ण रूप से विरहिणी ही अनुभव करती है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 602-603

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
