# सखी! क्यों, निज पिय पै इतराय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0636-M15-K053
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 53
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 299–299

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! क्यों, निज पिय पै इतराय।  
<a id="line-2"></a>जैसो है मेरो पिय तैसो, तेरो होइ न सकाय।  
<a id="line-3"></a>अरी वीर! तू का जाने जस, मेरो प्रियतम आय।  
<a id="line-4"></a>नेकु बताउ नाउँ वाको सखि!, जाको अस गुन गाय।  
<a id="line-5"></a>प्रथम बताउ तु ही निज पिय सखि!, जेहि बढ़ि-बढ़ि बतराय।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” हौं बतराऊँ सखि!, दोउन पिय बलभाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक श्री कृष्ण प्रेयसी से उसको सखी को विनोदमयी वार्ता) सखि! तू अपने प्रियतम पर इतना गुमान क्यों करती है? जैसा मेरा प्रियतम है वैसा तेरा प्रियतम स्वप्न में भी नहीं हो सकता। सखी ने उत्तर दिया -''अरी सखि! प्रियतम के समान तो मेरा ही प्रियतम है''। किया- "अच्छा सखि! बढ़ाकर गा रही है, तनिक उसका नाम तो बता? उत्तर दिया-'अपने जिस प्रियतम के विषय में तू बढ़-बढ़ कर बातें कर रही है पहिले तू ही उसका नाम बता''। कृपालु' ने कहा जब दोनों के प्रियतम के समान दोनों के ही प्रियतम हैं तब दोनों के प्रियतम के नाम को मैं बता सकता हूँ और वह नाम है, गोपीजन-वल्लभ श्यामसुन्दर।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 604-605

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
