# सखी! तू, काहे मोहिं छुपाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0637-M15-K054
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 54
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 299–299

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! तू, काहे मोहिं छुपाय।  
<a id="line-2"></a>हौं तो तोरी सगी सहेली, पुनि कत कहत लजाय।  
<a id="line-3"></a>हौं गइ जान मान नहिं भल तू, दृगन-चोट गइ खाय।  
<a id="line-4"></a>चितवनि गवनि हँसनि बतरावति, कोउ रसिया मन-भाय।  
<a id="line-5"></a>कहु सखि! तेरो वो कैसो है?, रूप रंग कस वाय।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” सखि! वो ऐसो है, जैसो है बलभाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक ब्रज-गोपी के श्यामसुन्दर-सम्बन्धी प्रेम का सखी द्वारा प्राकट्य) "अरी सखि! तू मुझसे क्यों छिपाती है? मैं तो तेरी सगी सखी हूँ, मुझसे बताने में क्या लज्जा है। ही न बताये और भले ही न माने, किन्तु मैं तो भली-भाँति जान गयी हूँ कि तू किसी प्रियतम के कटाक्ष से घायल हो चुकी है। तेरा रसमय देखना, चलना, हँसना, सिद्ध करता है कि तेरे मन में रसिया समा गया है। सच बता सखि! तेरा 'वरो'कैसा है? उसका रूप-रंग कैसा है? 'कृपालु' के शब्दों में सखी उत्तर देती है-अरी सखि! वे ऐसे हैं जैसे श्यामसुन्दर हैं। समान श्यामसुन्दर ही हो सकते हैं, अतएव स्वतः सिद्ध हो गया कि इस सखी के प्रियतम श्यामसुन्दर ही हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 605-606

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
