मिलन-माधुरी · पद 29
दई! हौ, लुटि गई बीच बजार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: daī hauṁ, luṭi gai bīcha bajāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दई! हौ, लुटि गई बीच बजार।
2गई रही घट-भरन यमुन-तट, सँग रहिं सखिन हजार।
3आय निपट नटखट झट पनघट, बोल्यो सखिन पुकार।
4हौं मानूँ पतिव्रत तिय तेहि जो, बारेक मोहिं निहार।
5हौं अनजान गुमान भरी तेहि, देख्यों टुक इक बार।
6लखतहिं हौं “कृपालु” भइ परबस, दइ सरबस गइ हार॥
हिन्दी भावार्थ
(एक श्याम प्रेम दीवानी ब्रजांगना का हृदयोद्गार ) हाय दैया! मैं तो आज संरे-बाजार लुट गयी। हजारों सखियों के साथ यमुना में पानी भरने गयी थी। इतने में ही उस निर्लज्ज नन्द-नन्दन ने पनघट पर आकर सभी सखियों को पुकार कर कहा-''सखियों! तुम लोगों में जो अपने पतिव्रता होने का दावा करती हो, मेरी ओर एक बार देख दे''। मैंने नासमझी में अहंकार से युक्त होकर एक बार ही थोड़ा-सा उसकी ओर देखा। 'कृपालु' के शब्दों में, उसे देखते ही मैं बरबस परबस (परवश) हो गयी और अपना सर्वस्व श्यामसुन्दर पर न्यौछावर कर दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 585