मिलन-माधुरी · पद 28
दई! हौं, गई धार-हूँ धार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: daī! hauṁ, gaī dhāra-hūṁ dhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दई! हौं, गई धार-हूँ धार।
2गई रही तट तरणि-तनूजा, तहँ आयो इक जार।
3वाते जोरि लई पिय नातो, जैसेहिं दृग भये चार।
4सखि कह"नाउँ बताय वाय सखि! जेहि बनाय भरतार"।
5सखि! सुनु तुम्हरे पति की भगिनी, को है सखी कुमार।
6सखि कह"कहा बकति मम पति कहँ, कब भयो ब्याहु हमार"।
7कह “कृपालु” भरतार बूझि गइ, नंदकुमार तिहार॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का श्याम-मिलन के आख्यान का र्णन) अरी दैया! मैं तो धारो-धार अर्थात् सब प्रकार से र्बाद हो गयी। अरी सखी! अचानक एक लम्पट आ गया। जैसे ही बरबस प्रियतम का नाता जोड़ लिया। ने उत्तर दिया "अरी सखी! की बहिन का कुमार है। बक रही है? मेरा पति कहाँ है? मेरा ब्याह कब हुआ है''? कृपालु' ने कहा-''अरी सखि! समझ गई। किसी भी स्त्री के किसी भी पति की कोई भी बहिन उसकी नन्द कहलाती है, उसका कुमार वही ब्रज विख्यात लम्पट नन्दकुमार ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 584-585