मिलन-माधुरी · पद 27
दई! हौ, आजु ठगाय गई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: daī! hauṁ, āju ṭhagāya gaī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दई! हौ, आजु ठगाय गई।
2गई रही सखि! कुसुम-सरोवर, सँग रहिं सखिन कई।
3प्रकट्यो आय अचानक छलिया, लतन कुंज उनई।
4मोते कही"सखी! तोहिं देखन, मैया मोहिं पठई।
5तोरी-मोरी होय सगाई, मैयन बात भई"।
6हौं पतियाय गई सँग मग महँ, मो गर बाँह दई।
7बात “कृपालु” झूठ निकली पै, तन मन लूटि लई॥
हिन्दी भावार्थ
न एक प्रेयसी का प्रियतम से प्रथम मधुर मिलन एवं उसका अपनी अन्तरंग सखी को प्रकट करना) अरी सखि! आज तो मैं अपना सर्वस्व खो बैठी। मैं अनेक सखियों के साथ कुसुम-सरोवर गयी थी, वहीं पर वह छलिया श्यामसुन्दर शुको हुई कुंज लताओं में छुपा खड़ा था। अचानक प्रकट हो गया और मुझसे बोला-''अरी सखि! तेरी मैया ने तुझको देखने के लिए मुझे भेजा है। मेरी और तेरी मैया में मेरी-तेरी सगाई को बात पक्की हो गई है। मैं भोली-भाली विश्वास करके उसके साथ चल दी। मार्ग में उसने मेरे गले में हाथ डालकर चिपटा लिया। 'कृपालु' कहते हैं घर पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि यह सब उसका छल था; किन्तु उसके आलिंगन के सुख में मैंने सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 583-584