मिलन-माधुरी · पद 26
दई अब, हारि गई सब दाउँ।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: daī aba, hāri gaī saba dāuṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दई अब, हारि गई सब दाउँ।
2गई रही दधि बेचन सजनी, हौं इकली नँद-गाउँ।
3तहँ देख्योँ इक लँगर देखतहिं, बिकि गइ रुकि गये पाउँ।
4कछुक बेर महँ सुधि सँभारि पुनि, पूछेउँ वाको नाउँ।
5नाउँ गाउँ सब जानि लई पै, कैसे काउ बताउँ।
6अब “कृपालु” उन पिय देखे बिनु, इक छिन रहि न सकाउँ॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का अपनी अन्तरंग सखी से श्यामसुन्दर के मिलन के वृत्तान्त का वर्णन) अरी दैया! मैं तो जुए में अपना सब कुछ हार गई। अरी सखि! मैं अकेली नन्दगाँव में दही बेचने गयी थी, वहाँ एक रसिया देखा। उसे देखते ही उसी के हाथों बिक गई एवं सुधि बुधि खो बैठी। थोड़ी देर बाद चेतना आने पर मैंने उसका परिचय पूछा। यद्यपि मैंने उसका नाम, गाँव आदि सब जान लिया, किन्तु किस प्रकार किसी से बताऊँ? 'कृपालु' के शब्दों में अब उन प्रियतम को देखे बिना एक क्षण को भी रहा नहीं जाता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 583