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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 25

तुम जीवन-जीवन जीवनधन।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tuma jīvana-jīvana jīvanadhana

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1तुम जीवन-जीवन जीवनधन।

2तिन जीवन जीवन बस जीवन,

3जिन जीवन, किय जीवन अरपन।

4जिन किय निज कहँ अरपन तिन कहँ,

5अरपन कर निज कहँ यह तव पन।

6तिन दिय भार डारि तोहिं शिशु जनु,

7तुम सँभार जननी जनु छन छन।

8तिनके अवगुन गिनत न अगनित,

9अगनित करि तिन कहँ इक गुन गन।

10कह “कृपालु” पुनि ते जिन जन जन,

11तिन मानत निज जन महँ प्रिय-जन॥

हिन्दी भावार्थ

हे जीवनधन श्यामसुन्दर! तुम समस्त जीवात्माओं को आत्मा हो। उन्हीं जीवों का जीवन धन्य है जिन जीवों ने अपना जीवन तुम्हें समर्पण कर दिया है। जो जीव अपने जीवन को तुम्हें समर्पित कर देते हैं उन्हें तुम भी अपने आप को समर्पित कर देते हो, यह तुम्हारा प्रण है। अपने को समर्पित किये हुये जीव नवजात शिशु की भाँति निश्चिन्त हो जाते हैं और तुम माता की तरह क्षण-क्षण में उनके योगक्षेम को वहन करते हो। उन शरणागत जीवों के अगणित अवगुणों को एक भी नहीं मानते एवं उनके एक गुण को अगणित करके मानते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि फिर उन शरणागत जीवों के भी जो शरणागत हो जते हैं उन्हें तुम अपने प्रियजनों में सर्वाधिक प्रियजन मानते हो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 582