मिलन-माधुरी · पद 24
छुवो जनि, मनमोहन तन मोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhuvo jani, manamohana tana mora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छुवो जनि, मनमोहन तन मोर।
2"सखि! मोहिं कह मनमोहन पुनि कत, इत ममता तनु तोर"।
3सखि कह"हौं पतिव्रता दियो मन, तन नहिं तोहिं चितचोर"।
4"सखि! काहुहिं व्रत होत मनहिं ते, सुनु यह श्रुतिन निचोर।
5सखि सुनु मर्म, सर्व-धर्मन तजि, जो भज नंदकिशोर।
6वाको पाप “कृपालु” क्षमा करि, देउँ प्रेम-रस बोर॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी की श्यामसुन्दर से विनोदमयी उक्ति-) हे मनमोहन! मेरे शरीर को मत छुओ। मनमोहन ने कहा अरी सखि! तू मुझे मनमोहन भी कहती है और शरीर से इतनी ममता भी रखती है''सखी ने कहा- "मैं पतित्रता स्त्री हूँ। मैंने तुम्हें मन दिया है, तन नहीं दिया।''मनमोहन ने कहा-अरी सखि! पतिब्रत अथवा कोई भी व्रत मन की आसक्ति से ही होता है। यह समस्त शास्त्रों वेदों का निचोड़ है। अरी सखि! सुन, जो सब धर्मो को छोड़कर मन से केवल मुझ से ही प्यार करता है- 'कृपालु' के शब्दों में मैं उसके धर्मों को छोड़ने एवं अन्य समस्त पापों को क्षमा कर देता हूँ और उसे प्रेम-रस में सराबोर कर देता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 581