मिलन-माधुरी · पद 30
परी मैं, काल लाल के जाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: parī maiṁ, kāla lāla ke jāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1परी मैं, काल लाल के जाल।
2गई अलिन सँग यमुन पुलिन तहँ, मिलि गयो मदन गोपाल।
3घूँघट पट ही सोँ टुक देख्योँ, चुपके ते नँदलाल।
4इतनेहिं माहिं छेड़ि दइ वाने, मुरलिहिं तान रसाल।
5सुधि बुधि भूलि गई सखि! सिगरी, सुनत तान ततकाल।
6गागरि संग “कृपालु” नागरिहुँ, गिरी धरणि बेहाल॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि हे सखि! कल मैं भी श्यामसुन्दर के प्रेम के जाल में फँस गयी। मैं सखियों के साथ यमुना के किनारें गयी थी। वहीं पर वह छलिया मिल गया। यद्यपि मैंने उसको घूँघट की ओट से चुपके से, थोड़ा-सा ही देखा किन्तु जब उसने मीठी मुरली की तान छेड़ दी तब तो मैं तुरन्त अपनी सुधि-बुधि खो बैठी। कृपालु' के शब्दों में वह नागरी गागरी के साथ ही विहल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 586