# दई! हौ, लुटि गई बीच बजार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0612-M15-K029
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 29
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 288–288

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>दई! हौ, लुटि गई बीच बजार।  
<a id="line-2"></a>गई रही घट-भरन यमुन-तट, सँग रहिं सखिन हजार।  
<a id="line-3"></a>आय निपट नटखट झट पनघट, बोल्यो सखिन पुकार।  
<a id="line-4"></a>हौं मानूँ पतिव्रत तिय तेहि जो, बारेक मोहिं निहार।  
<a id="line-5"></a>हौं अनजान गुमान भरी तेहि, देख्यों टुक इक बार।  
<a id="line-6"></a>लखतहिं हौं “कृपालु” भइ परबस, दइ सरबस गइ हार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक श्याम प्रेम दीवानी ब्रजांगना का हृदयोद्गार ) हाय दैया! मैं तो आज संरे-बाजार लुट गयी। हजारों सखियों के साथ यमुना में पानी भरने गयी थी। इतने में ही उस निर्लज्ज नन्द-नन्दन ने पनघट पर आकर सभी सखियों को पुकार कर कहा-''सखियों! तुम लोगों में जो अपने पतिव्रता होने का दावा करती हो, मेरी ओर एक बार देख दे''। मैंने नासमझी में अहंकार से युक्त होकर एक बार ही थोड़ा-सा उसकी ओर देखा। 'कृपालु' के शब्दों में, उसे देखते ही मैं बरबस परबस (परवश) हो गयी और अपना सर्वस्व श्यामसुन्दर पर न्यौछावर कर दिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 585

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
